History

क्षेत्र का निर्माण एवं विकास

सन 1979 का वर्षयोग संपन्न कर श्रमण परंपरा के मार्ग दर्शक सिद्धांत चक्रवर्ती, राष्ट्रसंत आचार्य 108 श्री विद्यानन्द जी मुनिराज, जब सहस्त्राब्दी सामारोह में सम्मिलित होने श्रवणबेलगोला की ओर मंगल विहार को तत्पर थे; उन्होने अपनी दिव्य द्रष्टि से इस पहाड़ी के अंत:करण मे गोम्मटेश भगवान बाहुबली के स्वरूप का अवलोकन किया था। क्षेत्र के निर्माण की परिकल्पना स्व. श्री दुलीचंदजी सेठी व स्व. श्री शांतिलालजी की पत्नी ने की थी।

11 फरवरी 1981 को श्रद्धेय श्रीमान बाबूलालजी पाटोदी के षष्ठी पूर्ति पर इंदौर के नागरिकों द्वारा आयोजित सार्वजनिक भव्य अभिनंदन समारोह में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय श्री अर्जुनसिंह सम्मिलित हुए थे। इस अवसर पर उन्होने इस पहाड़ी को भगवान बाहुबली की प्रतिमा स्थापित करने ऐवम अन्य जनकल्याणकारी गतिविधियों के संचालनार्थ सामाज को देने की घोषणा की थी।

पहाड़ी मिल जाने के बाद उसे विकसित करने की गंभीर समस्या जैसे; जहाँ पानी-बिजली नहीं, समतल भूमि नहीं, सिर्फ बड़ी-बड़ी चट्टानें, झाड़ियाँ, विषैले जीव, आवागमन का मार्ग नहीं, धन का अभाव इत्यादि अनेक परिस्थितियाँ चुनोती के रूप में सम्मुख थीं, परंतु स्व. श्री शांतिलालजी पाटनी एवं स्व. श्री दुलीचंदजी सेठी के अदम्य उत्साह एवं पाटोदी जी के साहस से फरवरी 1981 को पहाड़ी पर विकास एवं निर्माण हेतु विधिवत भूमि पूजन का कार्य संपन्न हुआ।

जनता ने क्षेत्र के विकास में पानी, बिजली, एवं अन्य व्यवस्था के लिए 2 लाख रुपये दान देने की घोषणा की। श्री पाटोदी के धर्मपिता, जननेता एवं मार्गदर्शक भैयाजी श्री मिश्रीलालजी गंगवाल ने दिलासा दिलाई की घबराओ नहीं, स्वप्न साकार होकर रहेगा।

निर्माण एवं इसके बीचों-बीच बाहुबली जी की प्रतिमा स्थापित करने की योजना में तत्काल ही धर्मानुरागियों ने एक-एक मंदिर निर्माण, एवं श्री शांतिलालजी पाटनी ने भगवान बाहुबली की प्रतिमा स्थापित करने की स्वीक्रती प्रदान की।

क्षेत्र निर्माण के प्रारम्भ में बाधाओं के निवारण हेतु पूज्य आचार्य श्री विध्यानन्द जी महाराज, आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज एवं आचार्य प्रवर श्री देशभूषणजी महाराज से चर्चा की एवं उनकी सम्मति अनुसार श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान एवं सवा लाख शांति जप का अनुष्ठान किया गया।

गोम्मटगिरी पर जीर्ण-शीर्ण बंगले का नवीनीकरण कर शुभ मुहुर्त में मारवाड़ी मंदिर से प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ एवं भगवान पार्श्वनाथ की सतिशय प्रतिमाओं के विराजमान होने से अनेकानेक आपत्ति-विपत्ति एवं संकटों का स्वयमेव ही निराकरण हो गया। साथ ही गोम्मटगिरी के विकास कार्य को गति प्राप्त हुई। मूर्ति विराजमान करने का प्रथम सौभाग्य श्री रतनलालजी पाटनी, बुरहानपुर वालों को प्राप्त हुआ। कर्तव्यनिष्ठ श्री कमलचंदजी सेठी ने सर्व प्रथम आवागमन की सुविधा हेतु सड़क निर्माण किया, जिसका वर्तमान नाम दुलीचंद सेठी मार्ग है। गोम्मटगिरी का निर्माण स्व. श्री रतनलालजी डेरियावाले के सहयोग के बिना संभव नहीं था।

5 फरवरी 1983 को चोबीस जिनालयों का निर्माण, अन्य 24 परिवारों के सौजन्य से कराया गया। 17 नवम्बर 1985 को एक 40X40 के खुले चबूतरे पर पूर्वविमुख मध्य से स्थापित 21 फूट उन्नत श्वेत संगमरमर की भगवान बाहुबली की कायोत्सर्ग प्रतिमा कमलासन पर विराजमान की गई। मंदिर के आर्किटैक्चर श्री के॰वी॰ नातू ने चौबिसी को अर्धचन्द्र का रूप दिया। प्रतिष्ठाचार्य प॰ श्री नाथूलालजी शाखी थे।

8 मार्च से 14 मार्च 1986 तक श्री चतुर्विशांति जिनबिम्ब पंचकल्याणक एवं भगवान बाहुबली प्रतिष्ठा महोत्सव परम पूज्य आचार्य श्री विध्यानंदजी, आचार्य रत्न श्री विमलसागरजी एवं अनेक मुनिगणों के ससानिध्य में सहितासूरी पंडित श्री नाथूलालजी शाखी के प्रतिष्ठाचार्यत्व में अद्वितीय विशाल समारोह एवं आयोजन के साथ संपन्न हुआ।

जैसा कि सहस्त्राब्दी पूर्व विंध्यगिरी के पाषाण मे छिपे भगवान बाहुबली को सिद्धांत चक्रवर्ती नेमिचंद्राचार्य के मार्गदर्शन मे सेनापति चामुंडाराय ने उकेरा था, उसी प्रकार सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य श्री विध्यानंदजी मुनिराज के तप, ध्यान, साधना, सानिध्य एवं प्रेरणा से पद्म श्री बाबूलालजी पाटोदी ने इस उपेक्षित निर्जन पहाड़ी को करुणा, प्रेम तपस्या के आदर्श केंद्र के रूप में परिवर्तित कर गोम्मटगिरी नाम से विकसित कर धन्य किया है।